कुछ शब्द ओस बनकर उतरते हैं,
आत्मा पर,
जहाँ पीड़ा भी अपने शोर से,
शर्मिंदा हो जाए।
वे मौन की हथेली पर रखे,
दीप जैसे हैं,
जो बिना जले ही अंधकार को समझा जाते हैं।
और कुछ शब्द,
पत्थर की भाषा बोलते हैं,
भरे हुए ज़ख़्मों से भी,
हिसाब माँग लेते हैं,
सन्नाटे की सिलाई उधड़ती है अचानक,
और दर्द फिर से बोलना सीख लेता है!!!

Good evening
आत्मा पर,
जहाँ पीड़ा भी अपने शोर से,
शर्मिंदा हो जाए।
वे मौन की हथेली पर रखे,
दीप जैसे हैं,
जो बिना जले ही अंधकार को समझा जाते हैं।
और कुछ शब्द,
पत्थर की भाषा बोलते हैं,
भरे हुए ज़ख़्मों से भी,
हिसाब माँग लेते हैं,
सन्नाटे की सिलाई उधड़ती है अचानक,
और दर्द फिर से बोलना सीख लेता है!!!

Good evening













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