वाह! बहुत खूब।...तख़्त-ए-सिकंदरी की नहीं जुस्तजू हमें,
तुम नज़र घुमाओ, हम खुद में एक ज़माना हैं…

Thank you bhaiवाह! बहुत खूब।...![]()
वाहतख़्त-ए-सिकंदरी की नहीं जुस्तजू हमें,
तुम नज़र घुमाओ, हम खुद में एक ज़माना हैं…
इक उम्र तक मैं उस की ज़रूरत बना रहावाह
ये तो बात ही अलग लेवल की है…
जो खुद में एक ज़माना हों, उन्हें तख़्त की क्या ज़रूरत!![]()
वाह…इक उम्र तक मैं उस की ज़रूरत बना रहा
फिर यूँ हुआ कि उस की ज़रूरत बदल गई

Takht-e-Sikandari ki nahi justuju humein,तख़्त-ए-सिकंदरी की नहीं जुस्तजू हमें,
तुम नज़र घुमाओ, हम खुद में एक ज़माना हैं…
Ek umr tak main us ki zarurat bana raha,इक उम्र तक मैं उस की ज़रूरत बना रहा
फिर यूँ हुआ कि उस की ज़रूरत बदल गई