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उसने कहा, तुम सिर्फ दर्द क्यों लिखते हो
प्रेम लिखा करो ना।
मैंने कहा,
यही तो है जो मेरा अपना है
प्रेम ठहरता ही कब है
किसी के पास।
फिर उसने कहा,
ठहरता तो कुछ भी नहीं,
ना प्रेम, ना ही दर्द।
सांसें मेरी, जिंदगी भी मेरी और मोहब्बत भी मेरी
मगर हर चीज मुकम्मल करने के लिए जरूरत है तेरी। रूह मेरी इश्क़ तेरा जान मेरी जिस्म तेरा,
जन्नत मिले पहलू में तेरे
बांहे तेरी और सुकून मेरा।
क्या वाकई में मैं तुम्हारा प्रेम हूं??? यदि हां, तो फिर मेरी बात मानते क्यूं नहीं
मेरी प्रतीक्षा, मेरे अहसासों को जानते क्यूं नहीं मेरे शब्दों की हक़ीक़त पहचानते क्यूं नहीं हां...
शायद.... यही नियति है प्रेम की
हम प्रेम में होते तो जरूर है मगर
स्वीकारते नहीं
मगर मैंने तो स्वीकार किया है....
बोलो ना.... ये सच है ना????
दिल की बात अल्फाजों से कहा है
ये बात और है कि तुम कभी समझी
तो कभी कभी समझी ही नहीं।

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