तुम्हे पसन्द करना, तुम्हे इश्क़ करना
कोई दस्तूर नहीं है
कोई रस्म, कोई रिवाज़ नहीं है
गिरा था कोई बीज, पहले से ज़मी में
मुकम्मल हवा चली,, मुकम्मल वक़्त पर
और पनपना लाज़मी था
मुझ से न सही, किसी और से सही
इश्क़ को तो होना ही था
शुक्र है कि मुझे तुझ से हुआ और
तुम्हे मुझसे हुआ
यह भी एक खूबसूरत इत्तेफाक था...,!!!

कोई दस्तूर नहीं है
कोई रस्म, कोई रिवाज़ नहीं है
गिरा था कोई बीज, पहले से ज़मी में
मुकम्मल हवा चली,, मुकम्मल वक़्त पर
और पनपना लाज़मी था
मुझ से न सही, किसी और से सही
इश्क़ को तो होना ही था
शुक्र है कि मुझे तुझ से हुआ और
तुम्हे मुझसे हुआ
यह भी एक खूबसूरत इत्तेफाक था...,!!!





















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