“ कुछ ऐसी भी बातें होती हैं ,
जो बरसात के सीले दिनों में ,
किसी गीले कपड़े सी ,
अक्सर आँगन की अलगनी पर लटकी ,
इंतज़ार करती रहती हैं ,
अपनी नमी के सूखने का
और
धीरे धीरे पीली पड़ जाती हैं ,
किसी
किताब में सूखी पीली पड़ी
याद सी ।
कुछ ऐसी भी बातें होती हैं ,
जो
घर की चौखट लांघ कर
बाहर निकल जाती हैं ,
और
चलते चलते अपने घर का पता भूल जाती हैं ,
भटकती रहती हैं
यहाँ वहाँ , दरवाज़ों पर दस्तक देती हैं ,
और
फिर एक दिन वो सच्ची बातें
अफ़वाह बन कर मर जाती हैं ।
कुछ ऐसी भी बातें होती हैं ,
जो कहना तो चाहती हैं
मगर ख़ामोश रह जाती हैं ,
अक्सर
ये सोच कर
अक्सर लोग आवाज़ों को समझते नहीं हैं
और
दफ़्न हो जाती हैं दिल में
एक दिन
नाकाम मोहब्बत बन कर ।
कुछ बातें ऐसी भी होती हैं ,
जो बस सुलगती रहती हैं
अपने आप में
किसी सिगरेट के धुएँ की तरह
और बुझ जाती हैं
एक दिन चुपचाप
किसी ऐस्ट्रे में ,
किसी के हाँटों का एहसास जीते जीते ।
कुछ ऐसी भी बातें होती हैं ,
मेरी और तुम्हारी तरह ,
जो ख़ामोश इंतज़ार करती रहती हैं
एक रिश्ते के नाम का
और
फिर एक दिन सो जाती हैं
करवट ले कर
बिना कुछ कहे ,
बिना कुछ सुने ,
“ फिर मिलेंगे” के ख़्याल में ।
कुछ बातें कैसी होनी चाहिए
मिल के तय कर लेना बेहतर होता है,
वक्त के भरोसे दूरियां बढ़ती हैं
कम कभी नहीं होतीं।
जो बरसात के सीले दिनों में ,
किसी गीले कपड़े सी ,
अक्सर आँगन की अलगनी पर लटकी ,
इंतज़ार करती रहती हैं ,
अपनी नमी के सूखने का
और
धीरे धीरे पीली पड़ जाती हैं ,
किसी
किताब में सूखी पीली पड़ी
याद सी ।
कुछ ऐसी भी बातें होती हैं ,
जो
घर की चौखट लांघ कर
बाहर निकल जाती हैं ,
और
चलते चलते अपने घर का पता भूल जाती हैं ,
भटकती रहती हैं
यहाँ वहाँ , दरवाज़ों पर दस्तक देती हैं ,
और
फिर एक दिन वो सच्ची बातें
अफ़वाह बन कर मर जाती हैं ।
कुछ ऐसी भी बातें होती हैं ,
जो कहना तो चाहती हैं
मगर ख़ामोश रह जाती हैं ,
अक्सर
ये सोच कर
अक्सर लोग आवाज़ों को समझते नहीं हैं
और
दफ़्न हो जाती हैं दिल में
एक दिन
नाकाम मोहब्बत बन कर ।
कुछ बातें ऐसी भी होती हैं ,
जो बस सुलगती रहती हैं
अपने आप में
किसी सिगरेट के धुएँ की तरह
और बुझ जाती हैं
एक दिन चुपचाप
किसी ऐस्ट्रे में ,
किसी के हाँटों का एहसास जीते जीते ।
कुछ ऐसी भी बातें होती हैं ,
मेरी और तुम्हारी तरह ,
जो ख़ामोश इंतज़ार करती रहती हैं
एक रिश्ते के नाम का
और
फिर एक दिन सो जाती हैं
करवट ले कर
बिना कुछ कहे ,
बिना कुछ सुने ,
“ फिर मिलेंगे” के ख़्याल में ।
कुछ बातें कैसी होनी चाहिए
मिल के तय कर लेना बेहतर होता है,
वक्त के भरोसे दूरियां बढ़ती हैं
कम कभी नहीं होतीं।

