PixiBloom
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मैं खड़ा हूँ यहाँ, सदियों का गवाह,
नाम मेरा इंडिया गेट, मेरा गौरव-राह।
अस्सी हज़ार वीरों की शौर्य गाथा हूँ मैं,
विश्व युद्ध के बलिदानों की अमर पहचान हूँ मैं।
एक समय था, जब मेरे मेहराब के नीचे,
जलती थी एक लौ, दिलों को छूती थी नीचे।
वो थी 'अमर जवान ज्योति', एक विश्वास पुराना,
बहत्तर की जंग का हर दर्द सुहाना।
हर शहीद की याद, हर माँ का वो आँसू,
उस पवित्र अग्नि में था हर भारतवासी महसूस।
पर समय रुका नहीं, इतिहास ने ली करवट नई,
वो लौ आज 'राष्ट्रीय युद्ध स्मारक' में समाई।
हाँ, वही ज्योति आज वहाँ भी जल रही है,
परम्परा अटल है, पर राह बदल गई है।
श्रद्धा और सम्मान की डोर नहीं टूटी है,
बलिदान की मशाल, वहाँ भी न छूटी है।
और मेरे पीछे देखो, वो छतरी, वो खाली स्थान,
वहाँ विराजे हैं अब, 'नेताजी' महान।
"तुम मुझे खून दो," जिसकी थी वो दहाड़,
वो सुभाष की मूरत, करती है ललकार।
आज़ादी के सपने का जो सच्चा सिपाही था,
मैं नहीं सिर्फ इमारत, मैं हूँ देश का प्रेम,
मैं शहीदों का स्वर्ग, मैं नया 'जय हिंद' का नेम।
आओ, मेरे कदमों पे माथा झुकाओ सब,
गर्व से कहो, "जय भारत!" यही हमारा रब।
ये इंडिया गेट नहीं, ये संकल्प का द्वार है,
जहाँ इतिहास, बलिदान और नया सँवर है!
आज खड़ा है यहीं, जो कभी जुदा ही था।
नाम मेरा इंडिया गेट, मेरा गौरव-राह।
अस्सी हज़ार वीरों की शौर्य गाथा हूँ मैं,
विश्व युद्ध के बलिदानों की अमर पहचान हूँ मैं।
एक समय था, जब मेरे मेहराब के नीचे,
जलती थी एक लौ, दिलों को छूती थी नीचे।
वो थी 'अमर जवान ज्योति', एक विश्वास पुराना,
बहत्तर की जंग का हर दर्द सुहाना।
हर शहीद की याद, हर माँ का वो आँसू,
उस पवित्र अग्नि में था हर भारतवासी महसूस।
पर समय रुका नहीं, इतिहास ने ली करवट नई,
वो लौ आज 'राष्ट्रीय युद्ध स्मारक' में समाई।
हाँ, वही ज्योति आज वहाँ भी जल रही है,
परम्परा अटल है, पर राह बदल गई है।
श्रद्धा और सम्मान की डोर नहीं टूटी है,
बलिदान की मशाल, वहाँ भी न छूटी है।
और मेरे पीछे देखो, वो छतरी, वो खाली स्थान,
वहाँ विराजे हैं अब, 'नेताजी' महान।
"तुम मुझे खून दो," जिसकी थी वो दहाड़,
वो सुभाष की मूरत, करती है ललकार।
आज़ादी के सपने का जो सच्चा सिपाही था,
मैं नहीं सिर्फ इमारत, मैं हूँ देश का प्रेम,
मैं शहीदों का स्वर्ग, मैं नया 'जय हिंद' का नेम।
आओ, मेरे कदमों पे माथा झुकाओ सब,
गर्व से कहो, "जय भारत!" यही हमारा रब।
ये इंडिया गेट नहीं, ये संकल्प का द्वार है,
जहाँ इतिहास, बलिदान और नया सँवर है!
आज खड़ा है यहीं, जो कभी जुदा ही था।


